भगवान बुद्ध का जीवन चरित्र एवं सिद्धांत

*भगवान बुद्ध का जीवन चरित्र एवं सिद्धांत*

*सिद्धार्थ का आरंभिक जीवन* 563 ईस्वी पूर्व इक्ष्वाकु वंश के शासक के राजा शुद्धोधन तथा माता महामाया के घर (लुम्बिनी) कपिलवस्तु में सिद्धार्थ का जन्म हुआ. मौसी गौतमी महाप्रजापति ने लालन पालन किया. जन्म के समय ही साधु दृष्टा असित ने भविष्यवाणी की कि यह बच्चा या तो महान राजा या महान पवित्र पथ प्रदर्शक बनेगा. उसके नामकरण पर भी सभी विद्वानों ने भविष्यवाणी दोहराई. किसी भी जीव जंतु के प्रति सिद्धार्थ का मन करुणा का रहता था. इन्होंने चचेरे भाई देवदत्त के तीर से घायल हंस की प्राण रक्षा की.

*युवा जीवन (शिक्षा, विवाह, वैभवशाली जीवन)* इन्होंने गुरु विश्वामित्र के पास वेद, उपनिषद, राजकाज और युद्धकला की शिक्षा ग्रहण की. 16 वर्ष की आयु में यशोधरा के साथ विवाह तथा पुत्र राहुल का जन्म. राजा शुद्धोधन के प्रयतन रहे कि सिद्धार्थ को बचपन से ही राजसी ठाठ, भोग विलास में लिप्त रखा जाये। अनेकों दास दासी उसकी सेवा में रहते थे। बगीचे की सैर करते हुए उसे एक दिन बूढ़ा व्यक्ति दूसरे दिन रोगी व्यक्ति, तीसरे दिन शव यात्रा और चौथे दिन एक संन्यासी के दर्शन हुए. संन्यासी संसार की सारी कामनाओं और भावनाओं से मुक्त था. इसके कारण सिद्धार्थ का मन संन्यास के प्रति आकर्षित हुआ और वे सब कुछ छोड़कर त्याग तपस्या के लिए निकल पड़े.

*परिव्राजक जीवन (ज्ञान प्राप्ति)* पहले तो तिल खाकर ओर बाद में निराहार कठोर तपस्या प्रारम्भ की.शरीर सूखकर काँटा हो गया. पैंतीस वर्ष की आयु में पीपल के पेड़ के नीचे वे ध्यान मग्न थे तभी सुजाता नाम की लड़की खीर लेकर के आयी और खीर खाने का आग्रह किया. उसने बुद्ध को कहा कि जिस प्रकार मेरी मनोकामनाएं पूरी हुई भगवान आपकी भी मनोकामना पूरी करें. कुछ खाओगे तो जीवित रहोगे. इससे बुद्ध को वास्तविक ज्ञान प्राप्त हुआ कि मध्यम मार्ग ही उत्तम मार्ग है. पीपल के वृक्ष के नीचे गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई जिसके कारण पीपल बोधिवृक्ष कहा गया और उस स्थान का नाम बोधगया पड़ गया. *बुद्ध की शिक्षाएं( धर्म चक्र प्रवर्तन)* वे सरल पाली भाषा में लोगों को धम्म की शिक्षा देते थे। इन्होंने बोधगया से निकलकर सारनाथ में अपना प्रथम मध्यम मार्ग का उपदेश दिया. उन्होंने कहा, दुःख दुख के कारण और उनके निवारण के लिए अष्टांग मार्ग है। उन्होंने कहा तृष्णा ही दुखों का वास्तविक कारण है, तृष्णा में व्यक्ति संसार के दुःख चक्कर में पिसता रहता है।

दुनिया का हर मनुष्य किसी न किसी दुख से दुखी हैं. तथागत बुद्ध ने बताया कि इस दुख की कोई न कोई वजह होती है और अगर मनुष्य दुःख निरोध के मार्ग पर चले तो इस दुख से मुक्ति पाई जा सकती है यही चार आर्य सत्य हैं।

*आर्य सत्य*
(1) *दुःख* संसार में दुःख है.
(2) *समुदय* दुख के कारण हैं (3) *निरोध* दुःख निवारण है. (4) *मार्ग* निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग है।

*भगवान बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग* दुख से मुक्ति पाने का रास्ता अष्टांगिक मार्ग कहलाता है। जन्म से मरण तक हम जो भी करते हैं उसका अंतिम मकसद केवल खुशी होता है.स्थायी खुशी सुनिश्चित करने के लिए हमें जीवन में इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।

*शील : अर्थात सदाचार।*
*सम्यक् वाणी* झूठ न बोलना, कटू वचन न कहना, चुगली न करना,निरर्थक बातचीत न करना.
*सम्यक् कर्म* किसी प्राणी की हत्या न करना, दूसरे की वस्तु न चुराना, व्यभिचार न करना, मादक पदार्थों का सेवन न करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना,
*सम्यक् आजीविका* किसी को धोखा देकर अथवा हानि कर लाभ न कमाना,

*समाधि : मन को वश में करना*
*सम्यक् व्यायाम* मन का व्यायाम अर्थात मन में जो दुर्गुण आते हैं उन्हें दूर करना और सद्गुणों को बढ़ाते रहना.
*सम्यक स्मृति* शरीर और चित्त के प्रपंच के प्रति सजग रहते हुए अनित्य बोध के आधार पर समता पुष्ट करना.
*सम्यक् समाधि* चित्त को एकाग्र करना, शरीर और चित्त के प्रति सतत जागरूक रहना.

*प्रज्ञा : मन की शुद्धि*
*सम्यक् संकल्प* मन का विचार, संकल्प विकल्प सही हो, मन शुद्धीकरण का संकल्प करना.
*सम्यक् दृष्टि* सम्यक दर्शन, जो वस्तु जैसी हो उसे वैसे ही उसके गुणधर्म स्वभाव में देखना,अनित्य बौध दृष्टिगोचर करना.

बौध धर्म के पांच अतिविशिष्ट वचन हैं जिन्हें पंचशील कहा जाता है और इन्हें हर गृहस्थ इंसान के लिए बनाया गया है। पंच शील बौद्ध धर्म की मूल आचार संहिता हैं :
(1) हिंसा न करना.
(2) चोरी न करना.
(3) व्यभिचार न करना.
(4) झूठ न बोलना.
(5) नशा न करना।

हर मनुष्य बुद्ध बन सकता है बौध धर्म में बुद्ध बनने के उपाय बताए गए हैं। बौद्ध धर्म की मान्यता है कि बुद्ध बनने की इच्छा रखने वाले को 10 पारमितायें पूरी करनी पड़ती हैं. ये पारमिताएँ हैं:

*दान, शील, नैष्क्रम्य, प्रज्ञा, वीर्य, शांति, सत्य, अधिष्ठान, मैत्री, और उपेक्षा*
पारमितायें नैतिक मूल्य होती हैं जिनका अनुशीलन बुद्धत्व की ओर ले जाता है।

*बंधुता का संदेश* उन्होंने समाज में बंधुत्व की भावना की शिक्षा देनी प्रारंभ की.बाबा साहब अम्बेडकर ने भी कहा है कि संविधान की उद्देशिका में जो समानता और बंधुत्व की भावना है वह फ्रांस की क्रांति से नहीं बल्कि तथागत के संदेश से प्राप्त की है, इसीलिए बाबा साहब भगवान तथागत को अपना गुरु मानते थे. उन्होंने बौद्ध मत भी इसलिए ग्रहण किया.
*अहिंसा* तथागत बुद्ध लोगों को अहिंसा की शिक्षा प्रदान करते थे. जिससे जन सामान्य एवं अनेक राजा भी प्रभावित हुए और उन्होंने युद्ध करना छोड़ दिया. उन्होंने अहिंसा के साथ आत्मरक्षा के उपदेश दिए.
*प्रकृति के साथ सहचर* तथागत बुद्ध ने केवल मनुष्य के साथ अहिंसा पर ही नहीं बल्कि इस चराचर जगत में उपस्थित सभी प्रकार के जीव जंतुओं की अहिंसा पर बल दिया. उन्होंने पशु बलि का विरोध किया तथा वनस्पति जगत की भी रक्षा पर बल दिया.
*जन सामान्य का जागरण* तथागत बुद्ध अपने उपदेशों में जन सामान्य का जागरण करते थे. उनके उपदेश सुनने के लिए बड़ी संख्या में स्त्री पुरुष,राजा महाराजा जुड़ने लगे. बड़ी संख्या में लोग बहुत भिक्षु और भिक्षुणी बनने लगे. बौद्ध बिहार बनने लगे.
*वर्तमान संदर्भ में अहिंसा तथा आत्मरक्षा (1974 तथा 1998 के परमाणु परीक्षण बुद्ध पूर्णिमा के दिन)* तथागत बुद्ध अहिंसा के साथ आत्मरक्षा की चर्चा भी करते थे, वे कहते थे आत्मरक्षा व्यक्ति के लिए आवश्यक है. इसी कारण भारत में विश्व में शांति स्थापना हेतु आत्मरक्षा के लिए अपने दोनों परमाणु परीक्षण बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही किए.दोनों परीक्षणों को *बुद्ध मुस्कुराए* नाम दिया.

*ब्रह्मदेश (म्यांमार में रोहिंग्या घटना चक्र)* बर्मा म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों ने उत्पात मचाना आरंभ किया.एक बौद्ध भिक्षु ईसन विराथु ने म्यांमार की जनता को आत्मरक्षा के लिए जागृत करने का काम किया, और उन्होंने अपनी आत्मरक्षा के लिए रोहिंग्याओं को म्यांमार से खदेड़ने का आह्वान बौद्ध जनता को किया. वहाँ की जनता, सेना, बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणी जागृत हुए और म्यांमार से रोहिंग्याओं को पूरी तरह से बाहर निकाल दिया. बर्मा के बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियों ने रोहिंग्या अत्याचारों से आत्मरक्षा की.

तथागत बुद्ध वास्तव में हिन्दू समाज में सुधार के लिए शिक्षा देते थे। और उन्होंने हिन्दू समाज को समरस होने का संदेश दिया. पुराणों में बुद्ध को भगवान विष्णु का नवां अवतार माना गया है. तथागत बुद्ध का जीवन आज भी हमारे लिए प्रासंगिक हैं।

प्रस्तुतकर्ता : प्रोफेसर सतीश कुमार जी

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