गीता और अर्थशास्त्र

27-05-2018

“गीता भारत की आध्यात्मिक अर्थ-शास्त्र को दर्शाने का कार्य करती है” – श्री अजेय कुमार

इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र ने रविवार 27 मई, 2018 को द्वारका में स्थित भास्कराचार्य महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) में एक गोष्ठी का आयोजन किया जिसका विषय “गीता और अर्थशास्त्र”रहा । इस गोष्ठी की अध्यक्षता श्री बलराम पाणि (प्राचार्य, भास्कराचार्य महाविद्यालय)  ने किया एवं इस गोष्ठी के मुख्य वक्ता श्री अजेय कुमार ( बौद्धिक शिक्षण प्रमुख, उत्तरक्षेत्र, रा. स्व. संघ ) रहे । इस कार्यक्रम का शुभारंभ दीप-प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना द्वारा हुआ । मंच संचालन डॉ विवेक जी ( राजधानी महाविद्यालय ) ने किया एवं इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र का परिचय डॉ रामचंद्र जी (अरविंदो महाविद्यालय ) ने दिया ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री बलराम पाणि जी ने कहा कि व्यक्ति अपने बुद्धि-धर्म के द्वारा ही तर्क-वितर्क कर सकता है जिसके लिए अध्ययन की अत्यंत आवश्यकता होती है और  इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र अध्ययन के क्षेत्र में उत्तम कार्य कर रहा है ।

गोष्ठी के विषय “गीता और अर्थ-शास्त्र” के विषय पर बोलते हुए श्री अजेय कुमार ने कहा कि गीता भारत की आध्यात्मिक अर्थ-शास्त्र को प्रस्तुत करने का कार्य करती है । किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन में अपने अर्थों की पूर्ति करते हुए कैसे स्वयं को व्यवस्थित करना है, इसी को गीता का आध्यात्मिक अर्थ-शास्त्र समझना चाहिए । मनुष्य को चाहिए कि वे अपने भौतिक सुख की अपेक्षा समाज, मानव एवं राष्ट्र हित की भलाई में अपने सुख को देखे और उसके अनुरूप अपने जीवन की व्यवस्था करें । उन्होंने कहा कि व्यक्ति अपनी जीवन की समस्याओं से तब तक बाहर नही आ सकता जब तक वह दूसरों की समस्याओं को अपनी समस्या समझकर उसको सुलझाने का कार्य  करता रहेगा । यहीं हाल हमारे देश भारत का है जो कि कई वर्षों से रूस, अमेरिका, ब्रिटेन और जापान के विकास को अपने विकास का आधार मानकर कार्य करता आया है । लेकिन बीते समय के साथ देश को चाहिए कि वह अपनी समस्याओं को अपना समझकर उसका हल निकाले ।

इस कार्यक्रम में श्री विनोद शर्मा “विवेक” जी (इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र प्रान्त प्रमुख, दिल्ली), श्रीमती मालती जी (पूर्व प्राचार्या, कालिन्दी महाविद्यालय एवं सदस्या, इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र) एवं श्री सुबोध जी (विभाग प्रचारक, पश्चिमी दिल्ली) मौजूद रहें।  कार्यक्रम का समापन विकास शर्मा (इंद्रप्रस्थ अध्ययन केंद्र) के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ ।

इंद्रप्रस्थ अध्ययन केन्द्र ( द्वारका इकाई)