नवसाम्यवाद एवं राष्ट्रीयता

16-09-2017

 ‘नवसाम्यवाद एवं राष्ट्रीयता’ प्रस्तुत विषय पर इन्द्रप्रस्थ अध्ययन केन्द्र, दिल्ली द्वारा एक परिचर्चा का आयोजन दीनदयाल शोध संस्थान, झंडेवालान , नई दिल्ली में किया गया . सत्र का शुभारम्भ सरस्वती वंदना तथा मुख्य अतिथियों के द्वारा भारत माता पर पुष्प अर्पित कर किया गया । मुख्य अथितियों का परिचय श्रीमान प्रवीण कपूर जी (सदस्य, इ.अ.के.) के द्वारा कराया ग़या इस परिचर्चा के मुख्य वक्ता श्रीमान प्रफुल्ल केतकर जी (संपादक, ओर्गनाइजर अंग्रेजी पाक्षिक पत्र), सुश्री ऐश्वर्या भाटी जी (अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय) थे व कार्यक्रम की अध्यक्षता मान. श्री आलोक कुमार जी (प्रांत सह संघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) ने की |श्री प्रफुल्ल केतकर जी ने नवसाम्यवाद के प्रारम्भ के इतिहास को बताते हुए कहा कि यह मार्क्सवाद से प्रथक आर्थिक क्रान्ति पर बल न देते हुए सांस्कृतिक क्रान्ति की बात करता है| श्री केतकर के अनुसार इसका श्रेय इटली के एन्तीनियो ग्राह्म्सी को जाता है| उन्होंने कहा कि नवसाम्यवाद ‘सेंटर फॉर कल्चरल स्टडीज’ के माध्यम से विश्व भर में स्थापित संस्कृति के स्थान पर नई संस्कृति के क्षेत्र को प्रस्थापित करना चाहता हैं| राष्ट्र एक सांस्कृतिक इकाई होने के कारण उसे वे सीधी चुनौती देते हैं| उन्होंने नवसाम्यवाद को मुद्दों को विखंडित कर व्यक्ति या वर्ग विशेष केन्द्रित बनाने में माहिर बताते हुए इसके चार आयामों को स्पष्ट किया| वे चार आयाम हैं- 1. शैक्षिक वाम (Acadamic Left) विचार के लिए 2. मीडिया वाम (Media Left) प्रचार के लिए 3. एन.जी.ओ. वाम (N.G.O. Left) आन्दोलन के लिए  4. राजनैतिक वाम (Political Left) समर्थन के लिए| ये चार दिखने में अलग हैं परन्तु एक ही उद्येश्य को स्थापित करने का काम करते हैं| अंत में श्री केतकर ने भारत के चिंतन को स्थापित करने की बात कही जो शोषणकारी न हो कर संवर्धनकारी है| इसके लिए उन्होंने सबसे बौद्धिक योद्धा बनकर आगे आने का आह्वान किया|

दूसरी वक्ता सुश्री ऐश्वर्या भाटी जी ने नवसाम्यवाद को अधिक हानिकारक, खतरनाक एवं विध्वंसक बताया| उन्होंने कहा कि ये जानबूझकर किसी भी मुद्दे को ‘बनाम’ (vs) का रूप देते हैं जबकि वहाँ ‘और’ (and) होना चाहिए जैसे- अधिकार और कर्तव्य| उन्होंने राष्ट्रीय प्रतीकों के माध्यम से भारत तत्व को समझाने का प्रयास किया| उन्होंने नवसाम्यवादियों द्वारा किये जा रहे अनैतिक और अपराधिक कृत्यों के खिलाफ अपनाये जाने वाले वैधानिक उपायों पर प्रकाश डाला| अंत में उन्होंने समान नागरिक सहिंता के न होने तथा अनुच्छेद 35(A) के दुष्परिणामों पर चर्चा करते हुए भारत की न्याय व्यवस्था को अद्वितीय बताया तथा समाज में वैचारिक रिक्त स्थान को सकारात्मकता से भरने का आह्वान किया अन्यथा नकारात्मकता स्वतः उस स्थान को अतिक्रमित कर लेगी|

मुख्य वक्तव्यों के पश्चात श्रोताओं से प्रश्न लिए गये जिनके उत्तर दोनों वक्ताओं ने दिए तत्पश्चात गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे मा.श्री आलोक कुमार जी ने नवसाम्यवाद के अंधेरे को राष्ट्रीयता के दीपक से समाप्त करने का उपाय बताया| उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रीयता को अनेक उदाहरणों को प्रस्तुत किया, जैसे- कन्याकुमारी में भगवान शिव को वर के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती की तपस्या तथा चार धाम यात्रा आदि| श्री आलोक कुमार जी ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अधिकार व कर्तव्य जैसे सभी विषयों को भारत के मौलिक चिंतन का भाग बताते हुए शास्त्रार्थ परंपरा तथा पति-पत्नी के रिस्ते का उदहारण दिया| निष्कर्षतः उन्होंने राष्ट्र की संकल्पना को सुदृढ़रूप से स्थापित करने पर जोर देते हुए अपनी वाणी को विराम दिया|

गोष्ठी में श्री अजेय जी (क्षेत्र बौद्धिक प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), श्री विनोद शर्मा ‘विवेक’ (संयोजक,इं.अ.के.,दिल्ली), श्री विजय जी (क्षेत्र सह कार्यावाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), श्री कमलजीत जी (स्वदेशी जागरण मंच), श्री सतीश जी (प्रान्त सह बौद्धिक प्रामुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ), श्री ओमकार जी आदि अन्य महानुभवों की गरिमामयी उपास्थिति रही| गोष्ठी का संचालन श्री विकास जी एवं सुश्री गीता भट्ट जी द्वारा किया गया| कार्यक्रम के अंत में डॉ.मालती जी (पूर्व प्राचार्य, कालिन्दी महाविद्यालय) के द्वारा इन्द्रप्रस्थ अध्ययन केन्द्र का परिचय दिया गया। तत्पश्चात श्री तरुण जी (सदस्य,इ.अ.के.) द्वारा कार्यक्रम में आए हुए विद्वानों एवं उपस्थित सभी सदस्यों के प्रति धन्यवाद् ज्ञापित किया गया ।