समान नागरिक संहिता – एक महत्वपूर्ण आवश्यकता

समान नागरिक संहिता का अर्थ है भारत में रहने वाले प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान कानून,चाहे वह किसी भी मत,पंथ अथवा जाति के क्यों न हो। समान नागरिक संहिता का लक्ष्य है व्यक्तिगत कानूनों यथा धार्मिक ग्रंथों एवं रिति रिवाजों पर आधारित कानून को संविधान के अंतर्गत एक राष्ट्रीय एवं सार्वजनिक कानून में प्रतिस्थापित करना हैं। इसके अंतर्गत विवाह,तलाक,उत्तराधिकार,गोद लेने एवं संरक्षण जैसे विषयों से संबंधित कानूनों को शामिल किया गया हैं।

हमारे देश में गोवा एक मात्र राज्य है जहा समान नागरिक संहिता और विषेश विवाह अधिनियम 1954 लागू हैं, जो किसी भी नागरिक को किसी विषेश धार्मिक कानून की परिधि से बाहर शादी करने को अनुमति देता है। इस संहिता में किसी विवाहित जोडें में पति या पत्नी द्वारा अधिग्रहीत सभी परिसंप्तियों में दोनों का संयुक्त स्वामित्व होता हैं। यहॉ तक कि माता पिता को भी अपनी संपति का कम से कम आधा हिस्सा अपने बच्चों को देना पडता है और ऐसे मुस्लिम व्यक्ति जिन्होंने गोवा में अपनी शादी पंजिकृत करा लिया है उन्हें भी बहुविवाह की अनुमति नहीं हैं।

हिन्दू कोड बिल जिसमें हिन्दू विवाह अधिनियम 1955,हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिन्दू अल्पसंख्यक और संरक्षता अधिनियम 1956 तथा हिन्दू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम 1956 जैसे विधेयक शामिल है और इसमें बौद्ध्,सिख,जैन के साथ हिन्दुओं के विभिन्न संप्रदायों से संबंधित कानूनों को शामिल किया गया हैं,जिसके तहत महिलाओं को तलाक और उत्तराधिर और शादी के लिए जाति को अप्रासंगिक बताया गया हैं, इसके साथ द्धिविवाह और बहुविवाह को समाप्त किया गया हैं।

इसी प्रकार किशोर न्याय अधिनियम 2014 को पारित कर लागू करने का फैसला एक समान नागरिक संहिता की दिशा में एक प्रयास प्रतित होता है क्योंकि यह अधिनियम मुस्लिम समुदाय के व्यक्तियों को बच्चों को गोद लेने की अनुमति देता हैं। जबकि मुसलमानों को उनके व्यक्तिगत कानून के तहत बच्चे को गोद लेने की अनुमति नहीं हैं।

समान नागरिक संहिता की संवैधानिक स्थिति : हमारे सविंधान के भाग—4 में राज्य के निति निदेशक तत्वो के रुप में अनुच्छेद 44 के अंतर्गत राज्य का यह दायित्व है कि भारत के राज्य क्षेत्र में निवास करने वाले सभी नागरिको को सुरक्षित करने के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करना चाहिए। समान नागरिक संहिता के इस भाव का हमारे संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता और विधिाओं के समान संरक्षण की प्रतिबद्धता देश के प्रत्येक व्यक्ति को प्रदान करता हैं। यहॉ तक कि 1976 में 42वें संविधान संसोधन में संविधान की उद्येशिका में पंथनिरपेक्ष शब्द को प्रयुक्त कर समान नागरिक संहिता की भावना को ही पुष्ट किया गया हैं। अत: इस आधार पर भी पंथनिरपेक्ष कानून की ही स्वीकार्यता उपयुक्त लगती है।

समान नागरिक संहिता पर सर्वोच्च न्यायालय का मत :

  • “मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम” के मामले में शाहबानो जो कि एक 62 वर्षीय मुसलमान महिला और पाँच बच्चों की माँ थीं जिन्हें 1978 में उनके पति ने शादी के 40 साल बाद तलाक दे दिया था। अपनी और अपने बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने के कारण शाहबानो ने पति से गुज़ारा भत्ता लेने के लिये अदालत पहुचीं। उच्चतम न्यायालय में यह मामला 1985 में पहुँचा| न्यायालय ने अपराध दंड संहिता की धारा 125 के अंतर्गत निर्णय दिया जो हर किसी पर लागू होता है चाहे वो किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का व्यक्ति हो। न्यायालय ने निर्देश दिया कि शाहबानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाय। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ ने कहा कि समान नागरिक संहिता से भारतीय कानून में व्याप्त असमानता दूर होगी जिससे राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में मदद मिलेगी| अतः उच्चतम न्यायालय ने संसद को समान नागरिक संहिता से संबंधित कानून बनाने का निर्देश दिया था|दूसरी ओर तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार अदालत के इस फैसले से संतुष्ट नहीं थी, सरकार ने इस फैसले का समर्थन करने के बजाय शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अमान्य ठहराया और मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण) कानून, 1986 को लागू किया एवं तलाक मामले में निर्णय लेने का अधिकार मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को दे दिया| इस कानून के वर्णित प्रयोजन के अनुसार जब एक मुसलमान तलाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुज़ारा नहीं कर सकती है तो न्यायालय उनके संबंधियों को उसे गुज़ारा देने का आदेश दे सकता है जो मुसलमान कानून के अनुसार उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। परंतु अगर ऐसे संबंधी नहीं हैं अथवा वे गुज़ारा देने की हालत में नहीं हैं, तो न्यायालय प्रदेश वक्फ़ बोर्ड को गुज़ारा देने का आदेश देगा। इस प्रकार से पति के गुज़ारा देने का उत्तरदायित्व इद्दत के समय के लिये सीमित कर दिया गया।
  • “सरला मुद्गल बनाम भारत संघ” के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता के संबंध में सरकार को निर्देश दिया हैं। इस केस में सवाल यह था कि क्या एक हिन्दू पति जिसने हिन्दू कानून के तहत शादी की हो लेकिन दूसरी शादी करने के लिए इस्लाम धर्म को कबूल कर सकता है| सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दूसरी शादी के लिए इस्लाम को कबूल करना निजी कानूनों का दुरुपयोग है| इसके अलावा उसने कहा कि हिन्दू विवाह को केवल हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 के तहत ही भंग किया जा सकता है अर्थात इस्लाम कबूल करने के बाद फिर से की गई शादी हिंदू विवाह कानून के तहत भंग नहीं की जा सकती है और इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 494 [5] के तहत एक अपराध माना जाएगा|
  • “जॉन वल्लामेट्टम बनाम भारत संघ” के मामले में केरल के पुजारी,जॉन वल्लामेट्टम ने वर्ष 1997 में एक रिट याचिका दायर की थी जिसमें कहा गया था कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 118 ईसाइयों के खिलाफ एवं भेदभाव पूर्ण है और यह ईसाइयों को अपने इच्छा से धार्मिक या धर्मार्थ प्रयोजन हेतु संपत्ति के दान पर अनुचित प्रतिबंध लगाता है| इस याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश वी.वी.खरे, न्यायमूर्ति एस.बी.सिन्हा और न्यायमूर्ति ए.आर.लक्ष्मणन की पीठ ने धारा 118 को असंवैधानिक घोषित कर दिया| इसके अलावा न्यायमूर्ति खरे ने कहा कि “अनुच्छेद 44 में वर्णित है कि राज्य भारत के सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र में सभी नागरिकों को एकसमान नागरिक संहिता प्रदान करने का प्रयास करेगा| लेकिन दुखः की बात यह है कि संविधान में वर्णित अनुच्छेद 44 को सही ढंग से लागू नहीं किया गया है|एकसमान नागरिक संहिता से विचारधाराओं के आधार पर विरोधाभास को दूर करके राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में मदद मिलेगी|

भारत सरकार का दायित्व : उपरोक्त विषयों को दृष्टिगत रखते हुए जब कोई राजनिति पार्टी समान नागरिक संहिता लागू करने की घोषणा चुनाव पूर्व करती है और इस विचार को जनता अपने मतदान द्वारा अनुमोदित कर एक पार्टी को बहुमत प्रदान करती हैं तो ऐसी स्थिति में जनता की इच्छा एवं आकांक्षाओं के उस घोषणा पत्र की भावनाओं को अक्षरश: क्रियांवित करना सत्ता पक्ष का राष्ट्रीय कर्तव्य बन जाता है।

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इस संबंध में जहां अल्पसंख्यक समुदाय का यह आधर कि संविधान का अनुच्छेद 25 उन्हें अंत:करण की स्वतंत्रता और धर्म के अवाध रुप से मानने,आचरण करने और प्रचार करने का स्वतंत्रता प्रदान करती हैं। अत: समान नागरिक संहिता लोगों पर थोपा नहीं जा सकता,वही यह कहना अत्यंत समीचीन होगा कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 25 के अ्रतर्गत अल्पसंख्यकों को उक्त अधिकार लोक व्यवस्था, सदाचार,स्वस्थ्य तथा संविधान के भाग—3 अन्य उपबंधों के अधीन हैं। एक मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 14,19 और 21 को भारतीय संविधान का स्वर्णिम त्रिभुज कहा हैं। जबकि अनुच्छेद 25 के लिए ऐसा नहीं हैं।

भारत में समान नागरिक संहिता को लेकर बडी बहस चल रही है,जबकि विश्व के कई देशों में,यथा फ्रांस, अमेंरिका, आस्ट्रेलिया, जर्मनी में एक सिविल कानून है, यहॉ तक कि पाकिस्तान ,बंगलादेश, तुर्की, इंडोनेसिया,मलेसिया,सुडान,इजिप्टि आदी देशों में भी समान नागरिक संहिता लागू हैं।

समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग का पक्ष

विधि और न्याय मंत्रालय द्वारा वर्ष 2016 में समान नागरिक संहिता से संबंधित मुद्दों के समग्र अध्ययन हेतु विधि आयोग का गठन किया गया।
विधि आयोग ने कहा कि समान नागरिक संहिता का मुद्दा मूलाधिकारों के तहत अनुच्छेद 14 और 25 के बीच द्वंद्व से प्रभावित है।
भारतीय बहुलवादी संस्कृति के साथ ही महिला अधिकारों की सर्वोच्चता के मुद्दे को इंगित किया। पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा की जा रही कार्यवाहियों के मद्देनज़र विधि आयोग ने कहा कि महिला अधिकारों को वरीयता देना प्रत्येक धर्म और संस्थान का कर्तव्य होना चाहिये। विधि आयोग के अनुसार, समाज में असमानता की स्थिति उत्पन्न करने वाली समस्त रुढ़ियों की समीक्षा की जानी चाहिये। इसलिये सभी निजी कानूनी प्रक्रियाओं को संहिताबद्ध करने की ज़रूरत है जिससे उनसे संबंधित पूर्वाग्रह और रूढ़िवादी तथ्य सामने आ सकें। वैश्विक स्तर पर प्रचलित मानवाधिकारों की दृष्टिकोण से सर्वमान्य व्यक्तिगत कानूनों को वरीयता मिलनी चाहिये। लड़कों और लड़कियों की विवाह की 18 वर्ष की आयु को न्यूनतम मानक के रूप में तय करने की सिफारिश की गई जिससे समाज में समानता स्थापित की जा सके। उपरोक्त विधि आयोग की सलाह को मानना सरकार की संवैधानिक बाध्यता नहीं हैं। फिर भी उपरोक्त सलाह को यथा योग्य समावेसित करते हुए समान नागरिक संहिता को लागू करना चाहिए जो कि राष्ट्रीय एकता का मूल आधार हैं। अत: एक आदर्श राज्य के नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए समान नागरिक संहिता एक आदर्श उपाय है। आज समय की मांग है कि सभी नागरिकों के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए किसी मत,पंथ,जाति एवं संप्रदाय की परवाह किए बिना समान नागरिक संहिता को संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना के अनुसार अक्षरश: लागू किया जाना चाहिए। क्योंकि इसके द्वारा पंथनिरपेक्षता व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता को सुनिश्चित करने वाला बंधुत्व भाव को चिरकाल तक बढाया जा सकता हैं,जो हमारे संविधान का मौलिक चिंतन हैं।

भगवान स्वरुप शुक्ल


स्थाई अधिवक्ता भारत सरकार
दिल्ली उच्च न्यायालय
ईमेल—bscgsc@gmail.com, bhdshukla@gmail.com